कल मैंने इस साल का चैत्र नवरात्रि का पञ्चाङ्ग यानि कि कैलेंडर देखा। मुझे ये देखकर बड़ी हैरानी हुई की नवरात्रि का दूसरा और तीसरा दिन, दोनों ही एक ही दिन यानि कि ३१ मार्च को मनाये जाने हैं। तो मैंने देवी दुर्गा से पूछा, "ये क्या माँ? अप्रैल फ़ूल से पहले ही अप्रैल फ़ूल! एक ही दिन पे २ - २ पूजा!" इस पर माँ ने मुझे बड़ा ही कमाल का जवाब दिया।
माँ बोलीं, "वत्स! ये अप्रैल फ़ूल नहीं, तुम्हारे आजकल के हाई टेक ज़माने का हाई स्पीड स्टाइल है। पहले मैंने ब्रह्मचारिणी के रूप में वर्षों तपस्या करके भगवान् शिव को पति रूप में पाया। फिर ढ़ेर सारी रस्मों के साथ चंद्रघंटा के रूप में उनसे विवाह किया। लेकिन तुम्हारे आजकल के ऑनलाइन ज़माने में इतना समय किसके पास है? इसलिए मैंने भी अपना स्टाइल थोड़ा बदल लिया।"
"आजकल पहली मुलाकात फेसबुक, ट्विटर या इंस्टाग्राम पर होती है। फिर व्हाट्सप्प मेसेजिंग और वीडियो कालिंग। और फिर कोर्ट में रजिस्टर्ड शादी। ज़्यादा से ज़्यादा १ महीने में २ अजनबी पति - पत्नी बन जाते हैं। तो मैंने सोचा कि क्यों न मैं भी आजकल की जनरेशन के साथ अपने आप को अपग्रेड कर लूँ? तो बस मैंने भी अपनी स्पीड बढ़ा ली। एक ही दिन में तपस्या और विवाह, दोनों संपन्न।"
मैंने माँ को साष्टांग दण्डवत प्रणाम किया और कहा, "जय हो माँ! आपने बिलकुल सही कहा। आजकल मुलाकात, बात और शादी की करामात तो हाई स्पीड ही होती है। लेकिन माँ, अब वो मंगल परिणय और सात जन्मों का साथ नहीं होता। पति पत्नी के बीच एक दुसरे के लिए बिना शर्त प्रेम, विश्वास और सम्मान नहीं होता। रस्में तो आज भी निभाई जाती हैं, लेकिन अब जनम जनम का रिश्ता नहीं बनता। २ अजनबी केवल १ महीने में पति पत्नी तो बन जाते हैं लेकिन १ जनम तो क्या १ साल भी साथ नहीं चल पाते हैं। अब केवल विवाह होता है, शुभ विवाह नहीं होता।"
"तो माँ! आपसे सविनय निवेदन है कि आप अपने ही समय से चलें। क्योंकि आज भी इस सम्पूर्ण सृष्टि का सबसे आदर्श, पवित्र और अटूट प्रेम, विश्वास और सम्मान से परिपूर्ण यदि कोई वैवाहिक सम्बन्ध है तो वो केवल और केवल एक ही है, भगवान् शिव और माता पार्वती।"







